हेल्थ टेक और वियरेबल्स: ये छोटी डिवाइसें असल में क्या कर रही हैं, कैसे काम करती हैं और आपको इनका इस्तेमाल कैसे करना चाहिए
आजकल कलाई पर एक छोटी सी घड़ी या बैंड देखकर लोग कह देते हैं — “मेरा स्टेप काउंट हो गया”, “मेरी हार्ट रेट हाई है”, “कल की नींद खराब थी”। ये सब हेल्थ टेक और वियरेबल डिवाइसेस की वजह से संभव हुआ है। लेकिन क्या ये डिवाइसें वाकई उतनी स्मार्ट हैं जितना हम सोचते हैं? इनके अंदर कौन-सी टेक्नोलॉजी काम करती है? कितना भरोसा करना चाहिए? और सबसे महत्वपूर्ण — इन्हें कब और कितना इस्तेमाल करना चाहिए? चलिए बिना किसी हाइप के, साफ-साफ बात करते हैं। वियरेबल्स का बाजार कितना बड़ा हो चुका है? 2025-26 में ग्लोबल वियरेबल टेक्नोलॉजी मार्केट लगभग 100-105 बिलियन डॉलर के आसपास पहुंच चुका है और आगे भी तेज़ी से बढ़ रहा है। फिटनेस ट्रैकर्स और मेडिकल-ग्रेड वियरेबल्स का हिस्सा खासतौर पर तेजी से बढ़ रहा है। लोग अब सिर्फ स्टेप्स गिनने तक सीमित नहीं रहना चाहते। वो लगातार हार्ट रेट, ब्लड ऑक्सीजन, स्लीप क्वालिटी और स्ट्रेस लेवल ट्रैक करना चाहते हैं। भारत में भी युवा और मिडिल-एज ग्रुप में इन डिवाइसेस की डिमांड काफी बढ़ी है। अंदर क्या होता है? टेक्नोलॉजी और लॉजिक समझिए ज्यादातर स्मार्टवॉच और फिटनेस बैंड मुख्य रूप से द...